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गुरुवार, 3 मई 2012

अन्नू भाई चला चकराता ...पम्म...पम्म...पम्म (भाग- 1)

आज अपना पहला यात्रा अनुभव आप लोगे से साझा करने जा रहा हूँ हिंदी लिखे हुए वैसे भी अरसा हो गया! इस ब्लॉग को शुरू करने से पहले याद भी नहीं पड़ता की अंतिम बार कब हिंदी में लिखा होगा! नौकरी के झमेले और आज कल की जिंदगी हो ही ऐसी गयी है....चलिए खैर मेरे हिंदी लेखन में होने वाली गलतियों/त्रुटियों पर आप सब से पहली और अंतिम बार क्षमा माग लेता हूँ ....आशा है आप सब मेरा उत्साहवर्धन कर त्रुटियों पर ध्यान न दे यात्रा अनुभवों का मजा लेंगे!!
 2011 दिवाली से कुछ दिन पहले मेरे खासम ख़ास दोस्त अनुज उर्फ़ अन्नू का फोन आया जॉब के कारण वो आज कल बंगलौर में रहता है ! अन्नू को हम यार दोस्त कीड़ा भी कहते है आप लोग समझ ही गए होंगे के कीड़ा मतलब....बोला भाई इस बार दिवाली की छुट्टियों में घर आऊंगा तो कही घुमने चलेंगे! हमारी घुमक्कड़ी की वजह से हम वैसे ही बदनाम रहते है सो उसे भी मैं ही याद आया , बोला प्रोग्राम ऐसा हो के बस हमेशा याद रहे, एक दम एडवेंचर से भरपूर! चलो खैर काफी कुछ दिन विचार विमर्श के बाद आखिर हमारे कहे अनुसार प्रोग्राम बना मेरे सबसे पसंदीदा प्रदेश उत्तराखंड में चकराता और लाखामंडल का, साथ में हमारे एक छोटे भाई साहब(मौसेरे भाई ) प्रवीण भी तैयार हो लिए, इन दिनों उनकी भी घुमक्कड़ अन्तरात्मा जागने लगी थी! समय की बाध्यता  को देखते हुए दो रातें और दिन दिन का प्रोग्राम बना , क्यूंकि भाई साहब की बंगलौर वापसी तय थी और हमारी भी ऑफिस की मज़बूरी ......सो सोचा भैया दूज वाले दिन तडके तड़क निकल शाम 3-4 बजे तक चकराता पहुचेगे बाकी बाद में देखेंगे .....
हमारे कीड़े भाई साहब अनुज जैन जी 




घुमक्कड़ी के नए सूरमा  प्रवीण कोशिक जी 























आखिर कार हंसी ख़ुशी दिवाली  मनाकर मैं और प्रवीण दोनों लोग  भैया दूज के दिन सुबह सुबह गाजियाबाद से चल दिए! हमारे कीड़े भाई साहब को यमुनानगर से हमे मिलना था और भैया दूज के कारण हमे शामली अपनी बहन के यहाँ से होकर जाना था! सो यह निश्चित हुआ के वो हमे सहारनपुर से आगे छुटमलपुर मिलेंगे! क्यूंकि वो बस से आने वाला था और हम अपने शवरले बीट कार से निकल पड़े! भाई साहब क्या बताये बहन जी के युपी के रास्तो का हाल ........जिनकी मेहरबानी की बदोलत यात्रा में पहले से लेट हो गए , दोपहर लघभग ढाई बजे हम छुटमलपुर पहुंचे, साल भर बाद अपने कीड़े भाई से गले मिलने का मजा ही अलग था! 
यूंपी के रास्ते.....
यहाँ से हमने देहरादून -मसूरी होते हुए चकराता जाना था यहाँ से चकराता जाना काफी सरल है. जाने के दो तरीके हैं, एक देहरादून से मसूरी और यमुना ब्रिज (155kms)  होते हुए एक दम पहाड़ी रास्ता और दूसरा  एक पारंपरिक  रास्ता देहरादून से विकासनगर और कलसी (130kms) होते हुए जो की कम पहाड़ी है लेकिन हम भी पुरे पक्के खिलाडी बन (वैसे भी अब तो तीनो ही वाहन चालक थे ) मसूरी वाला रास्ता चुन लिया!

रास्तो पर चलने के लिए एक रास्ता जिसे नक्शा  कहते हैं 

लेकिन किसी ने कहा है समय बड़ा बलवान हम देहरादूँन पहुचने वाले थे ही लगभग 10-12 किलोमीटर पहले हम जाम में फंस गए! रास्ता थोडा पहाड़ी था, सोचा हो गया होगा कुछ .....लेकिन भाई साहब 10-15 मिनट बाद हमारे अनुज भाई का कीड़ा जाग गया, बोला कुछ ज्यादा ही समय लग रहां है देख कर आता हु क्या बात है , वो चला गया! मैं और प्रवीण अपना गाने सुनने में मस्त हो गए जब काफी देर बाद भी अनुज नहीं आया तो मैं उसे देखने के बहाने पैदल ही चल पड़ा भाई साह्ह्हह्ह्ह्ब ...................क्या लम्बा जाम था लगभग दो किलोमीटर आगे जाकर देखता क्या हूँ के सड़क में बीचो बीच एक  एल पी जी गैस सिलेंडर का ट्रक उलट गया था पहाड़ी रोड होने की वजह  न आ सकते थे न जा सकते थे...लकिन हिन्दुस्तानी मोटरसाइकिल वाले कहीं रुकते है उनकी तो शान में फर्क आ जाता.....घुसे चले जा रहे थे ...........

कार से देखने पर  जाम का दृश्य 
पैदल चलते हुए लोग और उनके पीछे हम ....

कुछ देर बाद आर्मी वाले पहुचे लकिन बिनो साजो सामान यानी बिना क्र्रेन के सब व्यर्थ था! गाडी लोक कर मेरे पीछे पीछे प्रवीण भी आ पहुंचा! अब हम तीनो को आगे जाने की जल्दी लगी थी  .....हमने वहाँ अपनी मजोरटी का फायदा देख कुछ और नेता टाइप कर्मठ लोगो के साथ मिल रास्ता खोलने की जुगत लगाई! सभी मोटर साइकिल वालो को पीछे रोक, लोगो को तितर बितर कर एक बस में रस्सा ड़ाल ट्रक को खीच कर रोड से हटाने का एक और व्यर्थ प्रयास किया!

जय जवान ....जनता के साथ ये भी परेशान

ये जो पब्लिक है ....ये कहा मानती है 

थक हार कर कुछ और सोच हम वापिस अपनी कार की तरफ चल दिए यही विचार विमर्श करते हुए के क्या किया जाए ?


 शाम के पांच बजने वाले थे प्रकृति ने भी अपनी धुंदली सी चादर ओढ़ ली थी ! क्या करे कहाँ जाए? कभी सोचते ,एक कच्चे पक्के अनजान रास्ते  बेहट होते हुए जहा तक हो सके कम से कम विकास नगर पंहुचा जाए,या फिर यहाँ से वापिस जाकर रूडकी होते हुए आज रात हरीद्वार पंहुचा जाए ......आगे तो  जाम था ही जब तक हम अपनी कार पर पहुचे हमारे पीछे भी गाड़ियों की एक लम्बी क़तार लग चुकी थी ! ये लो........आसमान से टपके , खजूर में अटके .... आपको क्या लगता है क्या किया होगा हमने और क्या हमें करना चाहिये था ? जब तक आप लोग कुछ सुझाव दीजिये, ताकि हम जैसे अन्य लोग जब ऐसे फंसे तो क्या करना चाहिये! तब तक मैं अपने हाथो को विश्राम दे ऑफिस का कुछ कार्य निपटा कर ,आगे की कहानी के लिए जल्दी ही वापिस आता हूँ ! जाइयेगा नहीं अपनी सुझाव देते रहिये...... क्रमशः 

9 टिप्‍पणियां:

  1. bhaiya aage to bataye taki hum bhi aage tak pahuche..jissse hum kabhi esi paristhti me ho to apka mulayvan sughav hame aage tak pahuchaye.nahi to wahi asman se tapke
    khjur me atke

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    1. जरुर पीयूष भाई,आगे भी ले चलूँगा आपको और ऐसी स्थिति में हमने क्या किया हमने वो भी जल्दी ही बताऊंगा, बस तुम अपना प्यार ऐसे ही बनाये रखना :)

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  2. Pankaj ji bahut achcha likha hain, aapki agli post ka intezaar rahega.

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  3. धन्यवाद् प्रवीण जी, आपका इंतज़ार ज्यादा लम्बा नहीं होने दूंगा :)

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  4. घुमक्कड़ी इसे ही कहते हैं, जब मन आया और चल पड़े। बढिया पोस्ट्……… आगे इंतजार है।

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    1. धन्यवाद ! शर्मा जी जल्दी ही आगे का किस्सा आप लोगो के समक्ष पेश करूँगा

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  5. Rajaji national park chale jana chahiye tha, ek rastha dehradun se bhi hai ....mene bhi article likha hai chakrata or lakhamandal par time mile tho padana .....maheshndivya.blogspot.com

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  6. धन्यवाद महेश जी .. आप मेरी अगली दो पोस्ट पढ़ेंगे तो आपको पता चल जाएगा के हम कहाँ पहुंचेगे .. बाकी मैंने आपकी चकराता और लाखामंडल वाली सारी पोस्ट पढ़ी है और कमेंट भी किया है घुमक्कड़ साइट पर

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